एहसास

15 01 2008

‘इस धुँध की महक
कितनी सोंधी होती है ना!’
उस रात घने कोहरे में
साथ चलते-चलते तुमने कहा था.
स्ट्रीटलाईट की पीली रौशनी में,
तुमने मेरे कंधे पे हाथ रखकर जोर की एक साँस ली थी
और तुम्हारा चेहरा चमक गया था.
तुम्हारे बदन की तपिश
और किनारे खड़े लिप्टस की पत्तियों से
गिरते हुए ओस में
एक सोंधी सी,
भीनी-भीनी खुशबू का मुझे भी एहसास हुआ था.
मैंने जब तुम्हारी और देखा
तो शायद तुमने कहा था
‘मुझे तो इसी धुँध में अपनी ज़िंदगी गुजारनी है’
उस वक़्त मेरा ध्यान
तुम्हारे सिर के ऊपर से झाँक रहे चाँद की तरफ़ था.
वो चाँद तो मुझे अब याद नहीं
पर उस दिन से आज तक
मैं उसी धुँध में जी रहा हूँ.

याद है, जब मैं तुम्हे शिफौन पहनने को कहा करता था,
तुम शरमा के लाल हो जाती
और चुपके से हँसते हुए,
मेरे कंधे पर चेहरा छुपाकर मेरा गरदन चूम लेती थी.
आज जब भी मुझे
आलमीरे में वो शिफौन नज़र आता है,
मेरे कंधे पे एक आहट होती है
और वही, उस रात वाली,
सोंधी सी महक.
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कुछ भी नज़र नहीं आता.
वो कोहरा आज भी
मेरे गिर्द
ज़र्द होकर पड़ा है.

एक दिन तुमने
पागलों की तरह मुझे खींच कर
अपने जिस्म के आलिंगन में बाँध लिया था.
याद है, उस दिन
मेरे हाथों को अपने बदन से लिपटा पाकर
तुम्हारा जिस्म थर-थर काँपने लगा था,
मेरे पीठ सहलाने पर तुम तो धीरे-धीरे शांत हो गई थी,
लेकिन मेरा अस्तित्व
आज तक वैसे ही काँप रहा है,
वो तूफान कभी थमने का नाम ही नहीं लेता.
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने अपने स्वेटर को तेरी खुशबू से लबरेज़ पाया था,
वो मेरे आलमीरे में अब तक पड़ा है.

इस शहर में अब धुँध नहीं होती,
सिर्फ़ धुआँ दिखता है.
आज जब भी अपने होंठों पे हाथ फिराता हूँ,
तुम्हारा एहसास वहीं का वहीं पाता हूँ
और आईने में ख़ुद को हिलता नज़र आता हूँ.
रोज़ रात को जब तुम्हारी याद आती है,
मैं उठकर आलमीरा खोल देता हूँ,
जिस तरह मैं तुम्हारे लिए अपने घर का दरवाजा खोला करता था,
वो सोंधी से महक अब भी वहीं लेटी है.
और वो कुहरा,
मेरे बिस्तर में रात भर पैर समेटे सोता रहता है.

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गृहप्रवेश

18 10 2007

रिश्तों की तकसीम से
बनी दीवारों से आहत
इक शख्स ने टोका यूँ हीं.
मैं तीरगी में कुछ ढूँढ रहा था,
और कुछ शिकायत थी उनको,
वो अटक रहे थे,
मैं भटक रहा था.

उनकी पेशवा आंखें,
ठहरी बदहवास साँसे,
क्षुब्ध चेहरे से कुछ लम्हें धीरे से खाँसें –
क्या खोजते हो इस जहाँ में,
बिना छ्त के इस मकाँ में?

बुने थे कुछ चेहरे, चुने थे कुछ रिश्ते,
फ़िर फरिश्तों की ईंट से था घर इक बनाया.
चेहरे मुँह बाये खड़े रहे,
दीवार छ्त को खा गए,
आंखें स्तब्ध, ज़ुबाँ खामोश, न जाने कैसे ये मंजर आया.

मेरे लफ़्ज़ों से फूटे
चंद जुम्ले मुतबस्सुम-
बहते बादलों से जन्मे
एक बूँद ही हैं हम तुम.
सावन, आषाढ़, या सर्दी की हो लहरें,
झील, झरने, या नदी में हम ठहरें,
तेरे टूटे हुए छ्त या टपकें हरे दूब पे,
मुख्तलिफ परिभाषाएं, पर बूँद ही हैं हम तुम.

मिटटी के घर की छतों से बने शहरें,
या हो फ़िर देशों की सीमाओं पे पहरें,
घर की कमरों में क़ैद हवा
या तो सड़ जायेगी
या फ़िर छ्त तोडके उड़ जायेगी.
मुख्तलिफ रिश्ते, दोस्ती, नाते, वास्ते,
अलग-अलग कमरों जैसे
छ्त खोजते हुए दीवारों से जकडे राब्ते.

जितने बड़े रिश्ते, उतनी बड़ी जंजीरें,
जितनी चौडी दोस्ती, उतनी बंद कुशादगी.
और टूटी हुई छ्त
अट्टहास लगाती, याद दिलाती –
आकाश है प्रेम
जो खुले कायनात में पलता है,
हवा की दीवारों
और दूब की धरती में ही
सतरंगी खुशबू से नीला छ्त ढलता है.

तेरे बनाये घर से दबी है कायनात
सिसकती सदायें और बिखरे हयात,
बिला खौफो-खतर ये सफर छोड़ दो
बिना छ्त की बनी हर घर तोड़ दो,
खोज सच की है तो आओ दरवेश चलें
चरगे-इश्क दिल में जला गृहप्रवेश करें.

   
शब्दकोश:
तकसीम-बंटवारा, तीरगीअँधेरा, पेशवा- ज्ञानी, मंजर-दृश्य, मुतबस्सुम-मुस्कुराते हुए, मुख्तलिफ-भिन्न-भिन्न, तरह तरह के, कुशादगी-खुलापन, कायनात-धरती, सदायें-आवाजें, हयात-जीवन, बिला खौफो-खतर भय और दुःख के बिना, दरवेश-पवित्र स्थल.

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